"आख़िर हम कहानी बन जाते हैं..."



कभी किसी की यादों में,
तो कभी किसी की बातों में,
कभी अधूरी ख्वाहिशों के पन्नों पर,
तो कभी किसी की अधजली डायरी में।

हम जीते हैं, टूटते हैं,
कभी सहेजते हैं तो कभी बिखरते हैं,
पर वक्त की धूल जब उन पलों पर जमती है —
तो वो लम्हे… कहानी बन जाते हैं।

जिसे कोई सुनाता है मुस्कुराकर,
तो कोई सुनता है आंखें भिगोकर।

हम रिश्तों के किस्से होते हैं,
हम जज़्बातों के अफ़साने बनते हैं,
हम वो आवाज़ होते हैं,
जो कभी बोली नहीं जाती —
बस दिल में कहीं रह जाती है।

क्योंकि आख़िर में,
हम इंसान नहीं,
किसी के लिए याद, किसी के लिए सीख,
और किसी के लिए बस एक कहानी बन जाते हैं।

?


Comments

Anonymous said…
Good one

Popular posts from this blog

तीन चाकांची कहाणी...

श्रीमानयोगी.... वाचनातला माझा न थांबणारा प्रवास...